प्रश्न कर पाने की क्षमता ही मानव प्रगति का आधार है।
राजनीति अभ्यास है, चाहे उनका व्यवसाय कुछ भी रहा हो लेकिन यह नफरत करने वालों का एक व्यवस्थित संगठन होता है।
दिल्ली का आम आदमी देश को ये बताने में आगे आया है कि देश की राजनीति किस दिशा में जानी चाहिए।
90 प्रतिशत राजनेता दूसरे राजनेताओं की प्रतिष्ठा को ख़राब करते है।
यह तीसरा मोर्चा नहीं है, थका हुआ मोर्चा है।
(तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर)
नेता शिक्षित और सुयोग्य ही नहीं, प्रखर संकल्प वाला भी होना चाहिए, जो अपनी कथनी और करनी को एकरूप में रख सके।
सच्चे नेता आध्यात्मिक सिद्धियों द्वारा आत्म विश्वास फैलाते हैं। वही फैलकर अपना प्रभाव मुहल्ला, ग्राम, शहर, प्रांत और देश भर में व्याप्त हो जाता है।
सिर्फ राजनीति ही ऐसा व्यवसाय हो सकता है जिसके लिए कोई तैयारी जरूरी नहीं समझी जाती।
राजनीतिज्ञ हर जगह एक जैसे हैं, वे लोग वहां पुल बनाने का वादा करते हैं जहाँ नदी ही नहीं होती।
निर्णयों को तब तक स्थगित करते जाना जब तक कि वे प्रासंगिकता ही खो दें, राजनीति है।