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​​जितना कठिन आप काम करते जाते है, उतना ही वह आपके सामने आत्मसमर्पण करता जाता है।

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कर्म की उत्पत्ति विचार में है, अतः विचार ही महत्वपूर्ण है।

जो ​अपने से हो सके, वह काम दूसरे से ​ ​नहीं​ ​कराना​ ​ चाहिए।

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प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असम्भव नजर आता है।

कर्म करने मे ही अधिकार है, फल मे नही।

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जिसमे आत्मविश्वास नहीं उसमे अन्य चीजों के प्रति विश्वास कैसे उत्पन्न हो सकता ही​​।

​​जो अपने योग्य कर्म में जी जान से लगा रहता है, वही संसार में प्रशंसा का पात्र होता है​।

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कहने की प्रकृति छोडो, करने का अभ्यास करो।

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गलत काम करने का कोई सही तरीका नहीं है|

अपने काम में सुन्दरता तलाशो, उससे सुंदर और कुछ हों ही नहीं सकता।

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