हाल ही में प्रदर्शित 'मद्रास कैफे' में लिट्टे कार्यकर्ताओं को आतंकवादी के रूप में दिखाने पर अभिनेता जॉन अब्राहम पर तमिल समर्थकों ने आपत्ति जताई थी। जॉन का कहना है कि वह अपनी फिल्मों में हमेशा अव्यवस्था को दूर करना चाहते हैं। और ऐसा करने का साहस उन्हें दर्शकों से ही मिलता है। एक निर्माता के तौर पर उनकी पहली फिल्म 'विकी डोनर' में वीर्य दान करने जैसे संवेदनशील विषय को दिखाया गया था। वहीं मद्रास कैफे श्रीलंकाई गृह युद्ध पर आधारित है। एक मनोरंजक फिल्म है तो दूसरी उलझाने वाली।
जॉन ने कहा, "बहुत स्पष्ट कहूं तो अव्यवस्था तोड़ने वाला बनने का साहस दर्शकों से ही मिलता है। 'विकी डोनर' को सभी ने स्वीकार किया था। वास्तव में अगर कुछ राजनीतिक दल मेरी नई फिल्म पर आपत्ति कर रहे हैं तो मेरे लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। यह दर्शकों पर निर्भर करता है कि वे मेरी फिल्म को स्वीकार करते हैं या नहीं।"
'मद्रास कैफे' में जॉन ने रॉ के एजेंट की भूमिका निभाई है और नरगिस फाखरी ने युद्ध संवाददाता की भूमिका अदा की है। तमिल समर्थकों के विरोध के चलते तमिलनाडु में सिनेमाघरों के मालिकों ने इसे तमिल या हिंदी में प्रदर्शित नहीं किया था।
जॉन ने कहा, "मैं इस व्यवयसाय में नया हूं। लेकिन अगर मुझे अव्यवस्था तोड़ने वाला बनना है तो मुझे राजनैतिक बयान देना पड़ सकता है। एक फिल्म निर्माता के तौर पर लोकतांत्रिक देश में मुझे अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए।"
दर्शकों से मिलता है साहस : जॉन
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Monday, August 26, 2013


