धार्मिक वृत्ति बनाये रखने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं हो सकता और धार्मिक वृत्ति को खोने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता।
भगवान मूर्तियों में नहीं है। आपकी अनुभूति आपका ईश्वर है। आत्मा आपका मंदिर है।
किसी के साथ किसी भी प्रतियोगिता की कोई जरूरत नहीं है। जेसे तुम हो , आप वही हो।और आप पूरी तरह से ठीक हो .. आप अपने आपको स्वीकार करो।
हममें से कोई नहीं जानता कि अगले क्षण क्या होगा, फिर भी हम आगे बढ़ते हैं। क्योंकि हम भरोसा करते हैं। क्योंकि हमारे अंदर आस्था है।
जो सचमुच दयालु है, वही सचमुच बुद्धिमान है, और जो दूसरों से प्रेम नहीं करता उस पर ईश्वर की कृपा नहीं होती।
पूजा करते समय शरीर की मुद्रा नहीं, बल्कि ह्रदय की प्रवृत्ति मायने रखती है।
जब तक तुम स्वयं अपने में विश्वास नहीं करते, परमात्मा में तुम विश्वास नहीं कर सकते।
भगवान ऐसे लोगों को अभय कर देते हैं, जो उनमें विश्वास रखते हैं।
दान-पुण्य केवल परलोक में सुख देता है पर योग्य संतान सेवा द्वारा इहलोक और तर्पण द्वारा परलोक दोनों में सुख देती है।
रामायण समस्त मनुष्य जाति को अनिर्वचनीय सुख और शांति पहुँचाने का साधन है।



