पीड़ा से दृष्टि मिलती है, इसलिए आत्मपीड़न ही आत्मदर्शन का माध्यम है।

आत्मिक शक्ति ही वास्तविकता शक्ति है।

जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिंब नहीं पड़ता उसी प्रकार मलिन अंत:करण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिंब नहीं पड़ सकता।

आत्मा का घात नहीं होता, आत्मा का नाश नहीं होता, आत्मा तो अज़र अमर है।

दूसरे धर्मो की निंदा करना गलत है। सच्चा व्यक्ति वह है जो दूसरे धर्मो की भी हर उस बात का सम्मान करता है जो सम्मान के लायक है।

जो उपकार करे, उसका प्रत्युपकार करना चाहिए, यही सनातन धर्म है।

लगातार पवित्र विचार करते रहें। बुरे संस्कारों को दबाने लिए एकमात्र समाधान यही है।

तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

आस्था वो पक्षी है जो भोर के अँधेरे में भी उजाले को महसूस करता है।

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