कोई समझाए ये क्या...
कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का;
आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का;
गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों;
रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का;
चश्म-ए-साकी मुझे हर गाम पे याद आती है;
रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का;
अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे मे;
ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का;
मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ 'इक़बाल';
इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का।
कैसी अजीब ये तुझसे जुदाई थी कि तुझे अलविदा भी न कह सका;
तेरी सादगी में इतना फ़रेब था कि तुझे बेवफ़ा भी न कह सका।
हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे,
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर;
ए दिल! तुझे दुश्मनों की पहचान कहाँ,
तू हल्क़ा-ए-यारां में भी मोहतात रहा कर।
गुनाह करके सजा से डरते हैं;
ज़हर पी कर दवा से डरते हैं;
दुश्मनों के सितम का ख़ौफ़ नहीं हमें;
हम तो दोस्तों के ख़फ़ा होने से डरते हैं।
मोहब्बत से वो देखते हैं सभी को,
बस हम पर कभी ये इनायत नहीं होती;
मैं तो शीशा हूँ टूटना मेरी फ़ितरत है,
इसलिए मुझे पत्थरों से कोई शिकायत नहीं होती।
जो भी बुरा भला है...
जो भी बुरा भला है अल्लाह जानता है;
बंदे के दिल में क्या है अल्लाह जानता है;
ये फर्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है;
पर्दों में क्या छिपा है अल्लाह जानता है;
जाकर जहाँ से कोई वापिस नहीं है आता;
वो कौन सी जगह है अल्लाह जानता है;
नेक़ी-बदी को अपने कितना ही तू छिपाए;
अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है;
ये धूप-छाँव देखो ये सुबह-शाम देखो;
सब क्यों ये हो रहा है अल्लाह जानता है;
क़िस्मत के नाम को तो सब जानते हैं लेकिन क़िस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है।
कुछ ,मोहब्बत का नशा था पहले हम को 'फ़राज़';
दिल जो टूटा तो नशे से मोहब्बत हो गयी।
गुज़र गए हैं बहुत दिन रफ़ाक़त-ए-शब में;
इक उम्र हो गयी चेहरा वो चाँद सा देखे;
तेरे सिवा भी कई रंग खुश नज़र थे मगर;
जो तुझ को देख चुका हो वो और क्या देखे।
धड़कन बिना दिल का मतलब ही क्या;
रौशनी के बिना दिये का मतलब ही क्या;
क्यों कहते हैं लोग कि मोहब्बत न कर दर्द मिलता है;
वो क्या जाने कि दर्द बिना मोहब्बत का मतलब ही क्या।
चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं;
इस शौक में अपने बड़े नुकसान किये हैं;
महफ़िल में मुझे गालियाँ देकर है बहुत खुश;
जिस शख्स पर मैंने बड़े एहसान किये हैं।



