तेरे इश्क का बुखार है मुझको;
और हर चीज खाने की मनाही है;
एक हुस्न के हकीम ने सिर्फ;
तेरे चमन की मौसमी बताई है।
हर हसीं काफिरां के माथे पर;
अपनी रहमत का ताज रखता है;
तू भी परवरदिगार मेरी तरह;
आशिकाना मिज़ाज रखता है।
अगर तुम किसी को दिल की गहराइयों से चाहों;
तो ये उम्मीद मत करो कि वो भी तुम्हे चाहे;
लेकिन चाहों उसे इस कदर टूट के कि;
तुम्हारे सिवा किसी और का प्यार उसे पसंद ही न आए।
वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था;
आता न था नज़र तो नज़र का कुसूर था।
चुरा के मुट्ठी में दिल को छिपाए बैठे है;
बहाना यह है कि मेहंदी लगाए बैठे है।
तुम बहारों की आरजू न करो;
हमने कांटों में फूल देखे हैं।
जला कर शमा-ए-उल्फत आप ने फ़ौरन ही गुल कर दी;
खुदारा ये तो बता दीजिये कि अब परवानों का क्या होगा!
मैं क़ाबिल-ए-नफ़रत, हूँ तो छोड़ दो मुझको;
मगर यूं मुझसे दिखावे की मोहब्बत ना किया करो।
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई;
दोनों को इक अदा में रजामंद कर गई;
शक हो गया है सीना, ख़ुशी लज्जते-फ़िराक;
तकलीफे-पर्दादारी-ए-ज़ख्म-जिगर गई!
रिश्वत भी नहीं लेता कमबख्त जान छोड़ने की;
ये तेरा इश्क मुझे बहुत ईमानदार लगता है!



