अब नींद से कहो हम से सुलह कर ले फ़राज़;
वो दौर चला गया जिसके लिए हम जागा करते थे!
शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत, मर्सिये ने दिल को मेरे भी रुलाया है बहुत;
दी-ओ-कोहसर में रोता हूँ दहाड़े मार-मार, दिलबरान-ए-शहर ने मुझ को सताया है बहुत;
नहीं होता किसी से दिल गिरिफ़्ता इश्क़ का,ज़ाहिरा ग़मगीं उसे रहना ख़ुश आया है बहुत!
वो तो अपने दर्द रो-रो के सुनते रहे;
हमारी तन्हाइयों से आँख चुराते रहे;
और हमें बेवफा का नाम मिला क्योंकि;
हम हर दर्द मुस्कुरा कर छुपाते रहे!
ज़ख़्म जब मेरे सीने के भर जाएँगे;
आँसू भी मोती बनकर बिखर जाएँगे;
ये मत पूछना किस किस ने धोखा दिया;
वरना कुछ अपनो के चेहरे उतर जाएँगे।
बीते हुए कुछ दिन ऐसे हैं;
तन्हाई जिन्हें दोहराती है;
रो-रो के गुजरती हैं रातें;
आंखों में सहर हो जाती है!
गुलाब तो टूट कर बिखर जाता है;
पर खुशबु हवा में बरकरार रहती है;
जाने वाले तो छोड़ के चले जाते हैं;
पर एहसास तो दिलों में बरकरार रहते हैं।
दर्द ही सही मेरे इश्क का इनाम तो आया;
खाली ही सही हाथों में जाम तो आया;
मैं हूँ बेवफ़ा सबको बताया उसने;
यूँ ही सही, उसके लबों पे मेरा नाम तो आया।
दर्द अगर काजल होता तो आँखों में लगा लेते;
दर्द अगर आँचल होता तो अपने सर पर सजा लेते;
दर्द अगर समुंदर होता तो दिल को हम साहिल बना लेते;
और दर्द अगर तेरी मोहब्बत होती तो उसको चाहत-ऐ ला हासिल बना लेते।
हमनें जब किया दर्द-ए-दिल बयां, तो शेर बन गया;
लोगों ने सुना तो वाह वाह किया, दर्द और बढ़ गया;
मोहब्बत की पाक रूह मेरे साँसों में है;
ख़त लिखा जब गम कम करने के लिए तो गम और बढ़ गया।
शायद कि इधर आके कोई लौट गया है;
बेताबी से यूं मुंह को कलेजा नहीं आता।



