वो रात दर्द और सितम की रात होगी;
जिस रात रुखसत उनकी बारात होगी;
उठ जाता हूँ मैं ये सोचकर नींद से अक्सर;
कि एक गैर की बाहों में मेरी सारी कायनात होगी।

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मुद्दत गुज़र गयी कि यह आलम है मुस्तक़िल;
कोई सबब नहीं है मगर दिल उदास है।

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वक्त नूर को बेनूर कर देता है;
छोटे से जख्म को नासूर कर देता है;
कौन चाहता है अपनों से दूर होना;
लेकिन वक्त सबको मजबूर कर देता है।

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अंगुलिया टूट गई, पत्थर तराशते तराशते;
जब बनी सूरत यार की तो खरीददार आ गये!

इसी से जान गया मैं कि वक़्त ढलने लगे;
मैं थक के छाँव में बैठा और पाँव चलने लगे;
मैं दे रहा था सहारे तो एक हजूम में था;
जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे।

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आज तेरी याद हम सीने से लगा कर रोये;
तन्हाई मैं तुझे हम पास बुला कर रोये;
कई बार पुकारा इस दिल ने तुम्हें;
और हर बार तुम्हें ना पाकर हम रोये।

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देर तो लगती है भरने में उस को;
जिस ज़ख्म में हो अपनों की इनायत।

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दर्द है दिल में पर इसका एहसास नहीं होता;
रोता है दिल जब वो पास नहीं होता;
बरबाद हो गए हम उनकी मोहब्बत में;
और वो कहते हैं कि इस तरह प्यार नहीं होता।

फिर आज अश्क से आँखों में क्यों हैं आये हुए;
गुज़र गया है ज़माना तुझे भुलाये हुए।

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एक अजीब सा मंजर नज़र आता है;
हर एक आँसूं समंदर नज़र आता है;
कहाँ रखूं मैं शीशे सा दिल अपना;
हर किसी के हाथ मैं पत्थर नज़र आता है।

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