क्या गिला करें उन बातों से;
क्या शिक़वा करें उन रातों से;
कहें भला किसकी खता इसे हम;
कोई खेल गया फिर से जज़बातों से।
तुम्हारे पास नहीं तो फिर किस के पास है;
वो टूटा हुआ दिल आखिर गया कहाँ?
मुझको ऐसा दर्द मिला जिसकी दवा नहीं;
फिर भी खुश हूँ मुझे उस से कोई गिला नहीं;
और कितने आंसू बहाऊँ उस के लिए;
जिसको खुदा ने मेरे नसीब में लिखा ही नहीं।
मेरा ख़याल ज़ेहन से मिटा भी न सकोगे;
एक बार जो तुम मेरे गम से मिलोगे;
तो सारी उम्र मुस्करा न सकोगे।
बेखुदी ले गई कहाँ हमको;
देर से इंतज़ार है अपना;
रोते फिरते हैं सारी-सारी रात;
अब यही बस रोज़गार है अपना।
फिर नहीं बस्ते वो दिल जो एक बार उजड़ जाते है;
क़ब्रें जितनी भी संवारो वहाँ रौनक नहीं होती।
नया दर्द एक और दिल में जगा कर चला गया;
कल फिर वो मेरे शहर में आकर चला गया;
जिसे ढूंढ़ता रहा मैं लोगों की भीड़ में;
मुझसे वो अपने आप को छुपा कर चला गया।
दर्द की महफ़िल में एक शेयर हम भी अर्ज़ किया करते हैं;
न किसी से मरहम न, दुआओं कि उम्मीद किया करते हैं;
कई चेहरे लेकर लोग यहाँ जिया करते हैं;
हम इन आँसुओं को एक चेहरे के लिए पिया करते हैं|
तेरी आरज़ू मेरा ख्वाब है;
जिसका रास्ता बहुत खराब है;
मेरे ज़ख्म का अंदाज़ा न लगा;
दिल का हर पन्ना दर्द की किताब है।
कही ईसा, कहीं मौला, कहीं भगवान रहते है;
हमारे हाल से शायद सभी अंजान रहते हैं;
चले आये, तबीयत आज भारी सी लगी अपनी;
सुना था आपकी बस्ती में कुछ इंसान रहते है।



