ये शमा मेहमान है दो घडी की;
शमा बुझ जायेगी तुमसे जुदा होने के बाद;
कुछ भी कह लो हक़ है तुम्हें;
बस अब मर जायेंगे तुमसे जुदा होने के बाद।

तुम मिल जाओगे जब कभी;
तो इस दिल को आराम आएगा;
वरना खामोश सा रहेगा;
ये दिल तन्हाइयों में खो जायेगा।

बड़ी मुश्किल से बना हूँ टूट जाने के बाद;
मैं आज भी रो देता हूँ मुस्कुराने के बाद;
तुझ से मोहब्बत थी मुझे बेइन्तहा लेकिन;
अक्सर ये महसूस हुआ तेरे जाने के बाद।

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जिंदगी मोहताज नहीं मंज़िलों की वक्त हर मंजिल दिखा देता है;
मरता नहीं कोई किसी की जुदाई में वक्त सबको जीना सिखा देता है।

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फिर कहीं दूर से एक बार सदा दो मुझको;
मेरी तन्हाई का एहसास दिला मुझको;
तुम तो चाँद हो तुम्हें मेरी ज़रुरत क्या है;
मैं दिया हूँ किसी चौखट पे जला दो मुझको।

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तेरी आवाज़ की शहनाइयों से प्यार करते हैं;
तस्सवुर में तेरे तन्हाईओं से प्यार करते हैं;
जो मेरे नाम से तेरे नाम को जोड़ें ज़माने वाले;
अब हम उन चर्चों से प्यार करते हैं।

उस की चाहत का भरम क्या रखना;
दश्त-ए-हिजरां में क़दम क्या रखना;
हँस भी लेना कभी खुद पर 'मोहसिन';
हर घडी आँख को नम क्या रखना।

न कोई इल्ज़ाम, न कोई तंज़, न कोई रुस्वाई मीर;
दिन बहुत हो गए यारों ने कोई इनायत नहीं की।

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तुम बिन मेरी जात अधूरी, जैसे कोई बात अधूरी;
हिजर के सारे दिन पूरे, लेकिन है हर रात अधूरी।

आज भी सूना पड़ा है हर एक मंज़र;
तेरे जाने से सब कुछ वीरान लगता है;
उस रास्ते पे आज भी हम तेरी राह देखते हैं;
जहाँ से तेरा लौट आना आसान लगता है।

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