उधर ज़ुल्फ़ों में कंघी लग रही है और ख़म निकलता है;
इधर रग-रग से खिंच-खिंच के हमारा दम निकलता है;
इलाही ख़ैर कर उलझन पे उलझन पड़ती जाती है;
ना उनका ख़म निकलता है ना अपना दम निकलता है।

ख़म - उलझन

इश्क़ नाज़ुक मिजाज़ है बे-हद;
अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता।

sms

तू ही बता ए दिल तुम्हें समझाऊं कैसे;
जिसे चाहता है तू उसे नज़दीक लाऊँ कैसे;
यूँ तो हर तमन्ना हर एहसास है वो मेरा;
मगर उस एहसास को ये एहसास दिलाऊं कैसे।

क्या ज़रूरी है कि हम हार के जीतें 'तबिश';
इश्क़ का खेल बराबर भी तो हो सकता है!

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कभी लफ्ज़ भूल जाऊं, कभी बात भूल जाऊं;
तूझे इस क़द्र चाहूँ के अपनी ज़ात भूल जाऊं;
उठ के तेरे पास से जो में चल दूँ;
जाते हुए खुद को तेरे पास भूल जाऊं!

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अब मगर कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं हो सकता;
अपने जज़्बों से यह रंगीन शरारत न करो;
कितनी मासूम हो, नाज़ुक हो, हमाक़त न करो;
बार बार हाँ तुम से कहा था कि मोहब्बत न करो।

फिर न सिमटेगी मोहब्बत जो बिखर जायेगी;
ज़िंदगी ज़ुल्फ़ नहीं जो फिर संवर जायेगी;
थाम लो हाथ उसका जो प्यार करे तुमसे;
ये ज़िंदगी ठहरेगी नहीं जो गुज़र जायेगी।

जिस रंग में देखो उसे वो पर्दानशीं है;
और उस पे ये पर्दा है कि पर्दा ही नहीं है;
मुझ से कोई पूछे तेरे मिलने की अदायें;
दुनिया तो यह कहती है कि मुमकिन ही नहीं है।

कौन कहता है मोहब्बत की ज़ुबान होती है;
होंठों के बिना खुले ही हक़ीक़त बयां होती है;
इश्क़ वो खुदायी है मेरे दोस्त,
जो लफ़्ज़ों से नहीं आँखों से बयां होती है।

सरे राह जो उनसे नज़र मिली,
तो नक़्श दिल के उभर गए;
हम नज़र मिला कर झिझक गए,
वो नज़र झुका कर चले गए।

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