कसूर ना उनका था ना हमारा;
हम दोनों ही रिश्तों की रसम निभाते रहे;
वो दोस्ती का एहसास जताते रहे;
और हम मोहब्बत को दिल में छुपाते रहे।
वो खुदा था मेरा अब मेरा ईमान है;
चला गया छोड़ कर, इसलिए दिल उदास है;
बेवफा नही कहूंगा मैं उसको;
क्यूंकी इश्क़ करना उसका मुझ पर अहसान है।
प्यार में कोई तो दिल तोड़ देता है;
दोस्ती मेँ कोई तो भरोसा तोड़ देता है;
जिंदगी जीना तो कोई गुलाब से सीखे;
जो खुद टूट कर दो दिलों को जोड़ देता है।
कैसा सितम है आपका यह कि रोने भी नहीं देता;
करीब आते नहीं और खुद से जुदा होने भी नहीं देता।
जिस तरह रगों में खून रहता है;
इस तरह तेरी चाहत का जुनून रहता है;
ज़िंदगी की हर ख़ुशी मंसूब है तुमसे;
बात हो तुमसे तो दिल को सुकून रहता है।
अब भी आता है तेरा नाम मेरे नाम के साथ;
लोग जल जल कर ख़ाक हुए जाते हैं;
उड़ता है दिल से जैसे धुआँ;
बस वो छूने से ही राख हुए जाते है।
हाँ! मुझे रस्म-ए-मोहब्बत का सलीक़ा ही नहीं;
जा! किसी और का होने की इजाज़त है तुझे।
तलब करे तो मैं अपनी आँखें भी उन्हें देदू;
मगर ये लोग मेरी आँखों के ख्वाब मांगते हैं।
बड़ी मुद्दत से चाहा है तुम्हे;
बड़ी दुआओ से पाया है तुम्हे;
तुझे भुलाने का सोचूं भी कैसे;
किस्मत की लकीरों से चुराया है तुम्हें।
यह रात इतनी तन्हा क्यों होती है;
किस्मत से अपनी सबको शिकायत क्यों होती है;
अजीब खेल खेलती है ये किस्मत भी;
जिसे पा नहीं सकते उसी से मोहब्बत क्यों होती है।



