अक्ल कहती है, ना जा कूचा-ए-क़ातिल की तरफ;
सरफ़रोशी की हवस कहती है चल क्या होगा।
इश्क की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही;
दर्द कम हो कि ज्यादा हो, मगर हो तो सही।
वो दिल लेकर हमें बेदिल ना समझें उनसे कह देना;
जो हैं मारे हुए नज़रों के उनकी हर नज़र दिल है।
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-करार;
बेकरारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो ना थी।
जिस दिल में बसा था प्यार तेरा;
वो दिल तो कभी का तोड़ दिया;
बदनाम ना होने देंगे तुझे इसलिए;
तेरा नाम भी लेना छोड़ा दिया।
गहराई प्यार में हो तो बेवफाई नहीं होती;
सच्चे प्यार में कहीं तन्हाई नहीं होती;
मगर प्यार ज़रा संभल कर करना मेरे दोस्त;
प्यार के ज़ख्म की कोई दवा नहीं होती।
वो सामने थी और हम पलके उठा ना सके;
चाहते थे पर पास उनके जा ना सके;
ना देख ले वो अपनी तस्वीर हमारी आँखों में;
बस यही सोच कर हम उनसे नज़रे मिला ना सके।
हम नहीं जीत सके उनसे;
वो ऐसी शर्त लगाने लगे;
प्यारी सी आँखों को;
मेरी आँखों से लडाने लगे;
हम शायद जीत भी जाते;
पर पलके हमने तब झपकाई;
जब उनकी आँखों से आंसू आने लगे।
दूर जाकर भी हम दूर जा ना सकेंगे;
कितना रोयेंगे हम बता ना सकेंगे;
गम इसका नहीं कि आप मिल ना सकोगे;
दर्द इस बात का होगा कि हम आप को भुला ना सकेंगे।
ना चाहो किसी को ऐसे कि;
चाहत आपकी मज़बूरी बन जाए;
पर चाहो किसी को इतना कि;
आपका प्यार उसके लिए जरुरी बन जाए।



