डूबी हैं मेरी उँगलियाँ खुद अपने लहू में;
ये काँच के टुकड़ों को उठाने के सज़ा है।

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दर्द दे गए सितम भी दे गए;
ज़ख़्म के साथ वो मरहम भी दे गए;
दो लफ़्ज़ों से कर गए अपना मन हल्का;
और हमें कभी ना रोने की कसम दे गए।

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साँस थम जाती है पर जान नहीं जाती;
दर्द होता है पर आवाज़ नहीं आती;
अजीब लोग हैं इस ज़माने में ऐ दोस्त;
कोई भूल नहीं पाता और किसी को याद नहीं आती।

बस यही सोच कर हर तपिश में जलता आया हूँ;
धूप कितनी भी तेज़ हो समंदर नहीं सूखा करते।

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बहुत दर्द हैं ऐ जान-ए-अदा तेरी मोहब्बत में;
कैसे कह दूँ कि तुझे वफ़ा निभानी नहीं आती।

वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं;
कहाँ से लाएं लफ्ज़ जब हमको मिलते नहीं;
दर्द की ज़ुबान होती तो बता देते शायद;
वो ज़ख्म कैसे दिखाए जो दिखते नहीं।

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रोते रहे तुम भी, रोते रहे हम भी;
कहते रहे तुम भी और कहते रहे हम भी;
ना जाने इस ज़माने को हमारे इश्क़ से क्या नाराज़गी थी;
बस समझाते रहे तुम भी और समझाते रहे हम भी।

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है;
हद्द-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है।

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किसी ने यूँ ही पुछ लिया हमसे कि दर्द की कीमत क्या है;
हमने हँसते हुए कहा, पता नहीं कुछ अपने मुफ्त में दे जाते हैं।

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सब कुछ मिला सुकून की दौलत न मिली;
एक तुझको भूल जाने की मोहलत न मिली;
करने को बहुत काम थे अपने लिए मगर;
हमको तेरे ख्याल से कभी फुर्सत न मिली।

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