ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें;
यूँ ही कब तलक खुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबहेँ।

खून से जब जला दिया एक दिया बुझा हुआ;
फिर मुझे दे दिया गया एक दिया बुझा हुआ;
महफ़िल-ए-रंग-ओ-नूर की फिर मुझे याद आ गयी;
फिर मुझे याद आ गया एक दिया बुझा हुआ।

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए;
उन की सहेलियों के भी आँचल भिगो गए;
चौराहों का तो हुस्न बढ़ा शहर के मगर;
जो लोग नामवर थे वो पत्थर के हो गए।

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बुझते हुए अरमानों का इतना ही फ़साना है;
इश्क़ में तेरे हर पल हम को रहना है;
चाहे सितमगर कितने भी ज़ख़्म दे हमें;
इश्क़ में हर ज़ख्म हमें हँसते हुए सहना है।

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नशे में भी तेरा ही नाम लबों पर आता है;
चलते हुए मेरे पाँव लड़खड़ाते हैं;
एक टीस सी उठती है दिल में मेरे;
जब भी तेरा दिया हुआ दर्द याद आता है।

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दर्द-ए-दिल कम ना होगा ऐ सनम;
आपकी महफ़िल से जाने के बाद;
नाम बदनाम हमारा होगा;
आपकी ज़िन्दगी से जाने के बाद।

किसको दोष लगाएं अपनी बरबादी का हम;
इश्क़ की राहों में हम खुद ही गुनाहगार हैं;
जो लम्हें बिताये थे साथ मिलकर कभी;
आज वही लम्हें मेरे सितमगर हैं।

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लुटा चुका हूँ बहुत कुछ, अपनी जिंदगी में यारो;
मेरे वो ज़ज्बात तो ना लूटो, जो लिखकर बयाँ करता हूँ।

ऐसा नहीं के तेरे बाद अहल-ए-करम नहीं मिले;
तुझ सा नहीं मिला कोई, लोग तो कम नहीं मिले;
एक तेरी जुदाई के दर्द की बात और है;
जिन को न सह सके ये दिल, ऐसे तो गम नहीं मिले।

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खुद से भी ज्यादा उन्हें प्यार किया करते थे;
उनकी ही याद में दिन रात जिया करते थे;
गुज़रा नहीं जाता अब उन राहों से;
जहाँ रुक कर हम उनका इंतज़ार किया करते थे।

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