तुम न आए तो क्या सहर न हुई;
हाँ मगर चैन से बसर न हुई;
मेरा नाला सुना ज़माने ने;
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।

शब्दार्थ:
सहर = सुबह
बसर = गुजरना
नाला = रोना-धोना, शिकवा

कैसे बयान करे अब आलम दिल की बेबसी का;
वो क्या समझे दर्द इन आंखों की नमी का;
चाहने वाले उनके इतने हो गए हैं कि;
अब एहसास ही नहीं उन्हें हमारी कमी का।

इश्क़ में जिसके ये अहवाल बना रखा है;
अब वही कहता है इस वजह में क्या रखा है;
ले चले हो मुझे इस बज्म में यारो लेकिन;
कुछ मेरा हाल भी पहले से सुना रखा है।

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मोहब्बत और मौत की पसंद तो देखो;
एक को दिल चाहिए और दूसरे को धड़कन।

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मुझ से ऐ आईने मेरी बेकरारियाँ मत पूछ;
टूट जाएगा तू भी मेरी खामोशियाँ सुन के।

दिलों की बंद खिड़की खोलना अब जुर्म जैसा है;
भरी महफिल में सच बोलना अब जुर्म जैसा है;
हर ज्यादती को सहन कर लो चुपचाप;
शहर में इस तरह से चीखना जुर्म जैसा है।

तुम्हारे चाँद से चेहरे पे ग़म अच्छे नहीं लगते;
हमें कह दो चले जाओ जो हम अच्छे नहीं लगते;
हमें वो ज़ख्म दो जाना जो सारी उम्र ना भर पायें;
जो जल्दी भर के मिट जाएं वो ज़ख्म अच्छे नहीं लगते।

जब तक अपने दिल में उनका गम रहा;
हसरतों का रात दिन मातम रहा;
हिज्र में दिल का ना था साथी कोई;
दर्द उठ-उठ कर शरीक-ए-गम रहा।

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है परेशानियाँ यूँ तो, बहुत सी ज़िंदगी में;
तेरी मोहब्बत सा मगर, कोई तंग नहीं करता।

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दर्द आँखों में झलक जाता है पर होंठों तक नहीं आता;
ये मज़बूरी है मेरे इश्क़ की जो मिलता है खो जाता है;
उसे भूलने का जज़्बा तो हर रोज़ दिल में आता है;
पर कैसे भुला दे दिल, हर जर्रे में उसको पाता है।

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