फुर्सत किसे है ज़ख्मों को सरहाने की;
निगाहें बदल जाती हैं अपनों-बेगानों की;
तुम भी छोड़कर चले गए हो हमें ओ सनम;
अब तो तमन्ना ही नहीं रही किसी और से दिल लगाने की।

किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे;
गुज़र गयी जरस-ए-गुल उदास करके मुझे;
मैं सो रहा था किसी याद के शबिस्ताँ में;
जगा के छोड़ गए काफिले सहर के मुझे।

शब्दार्थ:
जरस-ए-गुल = फूलों की लड़ी
शबिस्ताँ = बिस्तर

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न मेरी कोई मंज़िल है न किनारा;
तन्हाई मेरी महफ़िल और यादें मेरा सहारा;
तुम से बिछड़ कि कुछ यूँ वक़्त गुज़ारा;
कभी ज़िंदगी को तरसे तो कभी मौत को पुकारा।

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ज़रा देखो ये दरवाज़े पर दस्तक किसने दी है;
अगर इश्क़ हो तो कहना यहाँ दिल नही रहता।

प्यार किसी से जितना किया रुस्वाई ही मिली है;
वफ़ा चाहे जितनी भी की बेवफाई ही मिली है;
जितना भी किसी को अपना बना कर देखा;
जब आँख खुली तो तन्हाई ही मिली है।

उसकी याद में हम बरसों रोते रहे;
बेवफ़ा वो निकले बदनाम हम होते रहे;
प्यार में मदहोशी का आलम तो देखिये;
धूल चेहरे पे थी और हम आईना साफ़ करते रहे।

किस फ़िक्र किस ख्याल में खोया हुआ सा है;
दिल आज तेरी याद को भूला हुआ सा है;
गुलशन में इस तरह कब आई थी फसल-ए-गुल;
हर फूल अपनी शाख से टूटा हुआ सा है।

शब्दार्थ:
फसल-ए-गुल = बहार का मौसम

हर वक़्त तेरी यादें तडपाती हैं मुझे;
आखिर इतना क्यों ये सताती है मुझे;
इश्क तो किया था तूने भी बड़े शौंक से;
अब क्यों नहीं यह एहसास दिलाती है तुझे।

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काश उसे चाहने का अरमान ना होता;
मैं होश में रहते हुए अनजान ना होता;
ना प्यार होता किसी पत्थर दिल से हमको;
या फिर कोई पत्थर दिल इंसान ना होता।

कोई 'अनीस' कोई आश्ना नहीं रखते;
किसी आस बग़ैर अज खुदा नहीं रखते;
किसी को क्या हो दिलों की शिकस्तगी की खबर;
कि टूटने में यह दिल सदा नहीं रखते।

शब्दार्थ:
शिकस्तगी = उदासी
सदा = आवाज़

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