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मोहब्बत हर इंसान को आज़माती है;
किसी से रूठ जाती है किसी पे मुस्कुराती है;
यह मोहब्बत का खेल ही कुछ ऐसा है;
किसी का कुछ नहीं जाता और किसी की जान चली जाती है।

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सबके दुःख हैं एक से मगर हौंसले हैं जुदा-जुदा;
कोई टूट कर बिखर गया तो कोई यूँ ही मुस्कुरा कर चल दिया।

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इश्क़ पाने की तमन्ना में कभी कभी ज़िंदगी खिलौना बन जाती है;
जिसे दिल में बसाना चाहते हैं वो सूरत सिर्फ याद बन रह जाती है।

'मजरूह' लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम;
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह।

शब्दार्थ:
अहल-ए-वफ़ा = वफ़ा के चाहने वाले लोग

इधर से आज वो गुज़रे तो मुँह फेरे हुए गुज़रे;
अब उन से भी हमारी बे-कसी देखी नहीं जाती।

मत पूछना ख़फ़ा होने का सबब मुझसे;
कैसे-कैसे खेले हैं किस्मत ने खेल मुझसे;
अब कैसे छिपाऊं अश्क इन आँखों में;
क्या बताऊँ अब क्या छूट गया है मुझसे।

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ज़ख़्म देने का अंदाज़ कुछ ऐसा है;
ज़ख़्म देकर पूछते हैं कि हाल कैसा है;
किसी एक से गिला अब क्या करें हम;
यहाँ तो सारी दुनिया का मिज़ाज़ एक जैसा है।

राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी;
दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े।

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मैं अपनी वफाओं का भरम ले के चली हूँ;
हाथों में मोहब्बत का आलम लेकर चली हूँ;
चलने ही नहीं देती यह वादे की ज़ंज़ीर;
मुश्किल था मगर इश्क़ के सारे सितम लेकर चली हूँ।

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अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता;
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता।

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