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दर्द कितने हैं यह बता नहीं सकता;
ज़ख़्म हैं कितने यह भी दिखा नहीं सकता;
आँखों से समझ सको तो समझ लो;
आँसू गिरे हैं कितने यह गिना नहीं सकता।

मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी;
शहर में जिस दिन क़त्ल हुआ मैं ईद मनाई लोगों ने।

तड़पते हैं न रोते हैं न हम फ़रियाद करते हैं;
सनम की याद में हर-दम ख़ुदा को याद करते हैं;
उन्हीं के इश्क़ में हम नाला-ओ-फ़रियाद करते हैं;
इलाही देखिये किस दिन हमें वो याद करते हैं।

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शोला था जल बुझा हूँ, हवाएं मुझे न दो;
मैं तो कब का जा चुका हूँ, सदायें मुझे न दो;
वो ज़हर भी पी चुका हूँ, जो तुमने मुझे दिया था;
आ गया हम मौत के आग़ोश में अब मुझे ज़िंदगी की दुआएं न दो।

तुम आज हँसते हो हंस लो मुझ पर ये आज़माइश ना बार-बार होगी;
मैं जानता हूं मुझे ख़बर है कि कल फ़ज़ा ख़ुशगवार होगी;
रहे मुहब्बत में ज़िन्दगी भर रहेगी ये कशमकश बराबर;
ना तुमको क़ुरबत में जीत होगी ना मुझको फुर्कत में हार होगी।

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इरादों में अभी भी क्यों इतनी जान बाकी है;
तेरे किये वादों का इम्तिहान अभी बाकी है;
अधूरी क्यों रह गयी तुम्हारी यह बेरुखी;
जबकि दिल के हर टुकड़े में तेरा नाम बाकी है।

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जिनकी आँखें आँसुओं से नम नहीं;
क्या समझते हो कि उन्हें कोई ग़म नहीं;
तुम तड़प कर रो दिए तो क्या हुआ;
ग़म छुपा कर हँसने वाले भी कम नहीं।

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देख कर उसको अक्सर हमे एहसास होता है;
कभी कभी गम देने वाला भी बहुत ख़ास होता है;
ये और बात है वो हर पल नही होता पास हमारे;
मगर उसका दिया गम अक्सर हमारे पास होता है।

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मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो;
काफ़िर अगर हज़ार बरस दिल में तू न हो;
क्या लुत्फ़-ए-इंतज़ार जो तू हीला-जू न हो;
किस काम का विसाल अगर आरज़ू न हो।

शब्दार्थ:
हीला-जू = बहाना करने वाला
विसाल = मिलन

एहसान किसी का वो रखते नहीं मेरा भी चुका दिया;
जितना खाया था नमक मेरा, मेरे जख्मों पर लगा दिया।

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