ये सानेहा भी मोहब्बत में बार-हा गुज़रा;
कि उस ने हाल भी पूछा तो आँख भर आई।
शब्दार्थ:
सानेहा = घटना
हमें कोई ग़म नहीं था ग़म-ए-आशिक़ी से पहले;
न थी दुश्मनी किसी से तेरी दोस्ती से पहले;
है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें;
तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
तुझ को पा कर भी न कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल;
इतना आसान तेरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं।
जिसको भी चाहा उसे शिद्दत से चाहा है 'फ़राज़';
सिलसिला टूटा नहीं है दर्द की ज़ंजीर का।
हर ज़ख़्म किसी ठोकर की मेहरबानी है;
मेरी ज़िंदगी की बस यही एक कहानी है;
मिटा देते सनम के हर दर्द को सीने से;
पर ये दर्द ही तो उसकी आखिरी निशानी है।
ज़रूरी नहीं कि जीने का कोई सहारा हो;
ज़रूरी नहीं कि जिसके हम हों वो भी हमारा हो;
कुछ कश्तियाँ डूब जाया करती हैं;
ज़रूरी नहीं कि हर कश्ती के नसीब में किनारा हो।
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना;
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।
रौशनी करता हूँ अँधेरा मिटाने के लिए;
शराब पीता हूँ मैं तुझको भुलाने के लिए;
क्यों न बन सकी तुम मेरी ज़िंदगी;
आज भी रोता हूँ सोच कर गुज़रे ज़माने के लिए।
ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है;
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।
फुर्सत किसे है ज़ख्मों को सरहाने की;
निगाहें बदल जाती हैं अपने बेगानों की;
तुम भी छोड़कर चले गए हमें;
अब तम्मना न रही किसी से दिल लगाने की।



