अपनी आँखों के समंदर में उत्तर जाने दे;
तेरा मुज़रिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे;
ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको;
सोचता हूँ कहूँ तुझसे, मगर जाने दे।
उल्फत का यह दस्तूर होता है;
जिसे चाहो वही हमसे दूर होता है;
दिल टूट कर बिखरता है इस क़द्र जैसे;
कांच का खिलौना गिरके चूर-चूर होता है!
सबने कहा इश्क़ दर्द है;
हमने कहा यह दर्द भी क़बूल है;
सबने कहा इस दर्द के साथ जी नहीं पाओगे;
हमने कहा इस दर्द के साथ मरना भी क़बूल है।
दोस्ती जब किसी से की जाये तो दुश्मनों की भी राय ली जाये;
मौत का ज़हर है फिज़ाओं में अब कहाँ जा कर सांस ली जाये;
बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ कि ये नदी कैसे पार की जाये;
मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे हैं आज फिर कोई भूल की जाये।
जो नजर से गुजर जाया करते हैं;
वो सितारे अक्सर टूट जाया करते हैं;
कुछ लोग दर्द को बयां नहीं होने देते,
बस चुपचाप बिखर जाया करते हैं।
धड़कन बिना दिल का मतलब ही क्या;
रौशनी के बिना दिये का मतलब ही क्या;
क्यों कहते हैं लोग कि मोहब्बत न कर दर्द मिलता है;
वो क्या जाने कि दर्द बिना मोहब्बत का मतलब ही क्या।
उम्मीद तो मंज़िल पे पहुँचने की बड़ी थी, तक़दीर मगर न जाने कहाँ सोयी पड़ी थी;
खुश थे कि गुजारेंगे रफाकत में सफ़र, तन्हाई मगर अब बाहों को फैलाये खड़ी थी।
बहुत अजीब हैं ये बंदिशें मोहब्बत की;
कोई किसी को टूट कर चाहता है;
और कोई किसी को चाह कर टूट जाता है।
उसकी आँखों में नज़र आता है सारा जहां मुझ को;
अफ़सोस कि उन आँखों में कभी खुद को नहीं देखा।
समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया;
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया;
ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में;
टूटा-फूटा बचा रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया।



