बड़े सुकून से रहता है वो आजकल मेरे बगैर;
जैसे किसी उलझन से छुटकारा मिल गया हो उसे...
शहर क्या देखें, के हर मंज़र में जाले पड़ गए;
ऐसी गर्मी है, कि पीले फूल काले पड़ गए;
मैं अँधेरों से बचा लाया था अपने आप को;
मेरा दुख ये है, मेरे पीछे उजाले पड़ गए।
मुझे मालूम है मैं उस के बिना ज़ी नहीं सकता;
उस का भी यही हाल है मगर किसी और के लिए।
अश्क़ आँखों से दिल से बददुआ निकली;
सितम किया याद जब कभी सितमगर का।
हँसते हुए ज़ख्मों को भुलाने लगे हैं हम;
हर दर्द के निशान मिटाने लगे हैं हम;
अब और कोई ज़ुल्म सताएगा क्या भला;
ज़ुल्मों सितम को अब तो सताने लगे हैं हम।
दुनिया वालों ने तो फकत उसको हवा दी थी;
लोग तो घर ही के थे आग लगाने वाले।
चूम कर कफ़न मेँ लिपटे मेरे चेहरे को;
उसने तड़प के कहा नये कपड़े क्या पहन लिए;
मेरी तरफ देखते भी नही।
इतना, आसान हूँ कि हर किसी को समझ आ जाता हूँ;
शायद तुमने ही पन्ने छोड़ छोड़ कर पढ़ा है मुझे।
तेरी यादों के सितम सहते हैं हम;
आज भी पल-पल तेरी यादों में मरते हैं हम;
तुम तो चले गए बहुत दूर, हमको इस दुनियां में तन्हा छोड़कर;
पर तुम क्या जानो, बैठकर तन्हाई में किस कदर रोते हैं हम।
इतना भी इख्तियार नहीं मुझको वज़्म में;
शमाएँ अगर बुझें तो मैं दिल को जला सकूँ।



