रफ़्तार कुछ इस कदर तेज़ है जिन्दगी की;
कि सुबह का दर्द शाम को, पुराना हो जाता है।
दिल के छालों को कोई शायरी कहे तो दर्द नहीं होता;
तक़लीफ़ तो तब होती है जब लोग वाह-वाह करते है।
ज़िस्म से मेरे तडपता दिल कोई तो खींच लो;
मैं बगैर इसके भी जी लूँगा मुझे अब ये यकीन है।
तुम फिर ना आ सकोगे, बताना तो था ना मुझे;
तुम दूर जा कर बस गए, और मैं ढूँढता रह गया।
लौट जाती है दुनिया गम हमारा देख कर;
जैसे लौट जाती हैं लहरें किनारा देखकर;
तुम कंधा ना देना मेरे जनाज़े को;
कहीं फिर से ज़िंदा ना हो जाऊँ तेरा सहारा देखकर।
ना ये महफिल अजीब है, ना ये मंजर अजीब है;
जो उसने चलाया वो खंजर अजीब है;
ना डूबने देता है, ना उबरने देता है;
उसकी आँखों का वो समंदर अजीब है।
वो जान गया हमें दर्द में भी मुस्कुराने की आदत है;
इसलिए वो रोज़ नया दुःख देता है मेरी ख़ुशी के लिए।
हमने कब माँगा है तुम से अपनी वफाओं का सिला;
बस दर्द देते रहा करो मोहब्बत भर्ती जाएगी।
दर्द से अब हम खेलना सीख गए;
हम बेवफाई के साथ जीना सीख गए;
क्या बताएं किस कदर दिल टूटा है मेरा;
मौत से पहले, कफ़न ओढ़ कर सोना सीख गए।
ना जाने क्यूँ नज़र लगी ज़माने की;
अब वजह मिलती नहीं मुस्कुराने की;
तुम्हारा गुस्सा होना तो जायज़ था;
हमारी आदत छूट गयी मनाने की।



