होंठो ने तेरा ज़िक्र न किया पर मेरी आंखे तुझे पैग़ाम देती है;
हम दुनियाँ से तुझे छुपाएँ कैसे मेरी हर शायरी तेरा ही नाम लेती है!
एक तुम हो कि वफा तुमसे न होगी, न हुई,
एक हम कि तकाजा न किया है, न करेंगे।
बरसात में जो ग़म भीग जाते हैं;
मैं धूप में उन्हें सुखाता रहता हूँ!
ये आइने अब घर के सँवरते क्यूँ नहीं;
वो ज़ुल्फ़ के सायें बिखरते क्यूँ नहीं;
लगता है ऐसे के बिछड़े हैं अभी-अभी;
भूले से भी उन्हें हम भूलते क्यूँ नहीं!
ख़ुशी और ग़म को समझता नहीं हूँ;
वही है हाल अब जो कहता नहीं हूँ;
ये वादों - कसमों को निभाना क्या है;
मैं तो इक पल भी तुम्हें भूलता नहीं हूँ!
रिश्तों को शब्दों का मोहताज ना बनाइये,
वो अगर खामोश है तो आप ही आवाज़ लगाइये!
इजहार गर जुबां से हो तो मजा क्या है;
चाहने वाला जो निगाहों को पढ़े तो बुरा क्या है!
मसरूफ़ हैं यहाँ लोग, दूसरों की कहानियाँ जानने में;
इतनी शिद्दत से ख़ुद को अगर पढ़ते, तो ख़ुद़ा हो जाते!
किताब -ए- दिल का कोई भी पन्ना सादा नहीं होता;
निगाह उस को भी पढ़ लेती है जो लिखा नही होता!
देख कर मेरी आँखें, एक फकीर कहने लगा;
पलकें तुम्हारी नाज़ुक है, खवाबों का वज़न कम कीजिये!



