चाहतों ने किया मुझ पे ऐसा असर;
जहाँ देखूं मैं देखूं तुम्हें हमसफसर;
मेरी खामोशियाँ भी जुबान बन गयी;
मेरी खामोशियाँ दास्तान बन गयी।
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता;
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
हाथो की लकीरों के फरेब में मत आना मेरे दोस्तो;
ज्योतिषयो की दुकानों पर मुकद्दर नहीं बिकते।
किसी बेकस को ऐ बेदाद गर मारा तो क्या मारा;
जो आप ही मर रहा हो उस को गर मारा तो क्या मारा।
क्यों मरते हो यारो, बेवफा सनम के लिए;
दो गज़ ज़मीन भी नहीं मिलेगी तेरे दफ़न के लिए;
मरना है तो मरो अपने वतन के लिए;
हसीना भी दुपट्टा उतार देगी तुम्हारे कफ़न के लिए।
मालूम है दुनिया को ये 'हसरत' की हक़ीक़त;
ख़ल्वत में वो मय-ख़्वार है जल्वत में नमाज़ी।
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी;
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी।
ख़बर नहीं थी किसी को कहाँ कहाँ कोई है;
हर इक तरफ़ से सदा आ रही थी याँ कोई है;
यहीं कहीं पे कोई शहर बस रहा था अभी;
तलाश कीजिये उसका अगर निशाँ कोई है।
एक नफरत ही है जिसे दुनिया लम्हों में ही जान जाती है;
वरना चाहत का पता लगाने में तो ज़माने बीत जाते हैं।
अजब पहेलियाँ हैं मेरे हाथों की इन लकीरों में;
सफर तो लिखा है मगर मंज़िलों का निशान नहीं।



