हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम;
हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं;
तुम कौन हो ये खुद भी नहीं जानती हो तुम;
मैं कौन हूँ ये खुद भी नहीं जानता हूँ मैं।
कुछ मैं भी थक गयी हूँ उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते;
कुछ ज़िंदगी के पास भी मोहलत नहीं रही;
उसकी एक-एक अदा से झलकने लगा था खलूस;
जब मुझ को ही ऐतबार की आदत नहीं रही।
अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी;
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन।
बरसों हुए न तुम ने किया भूल कर भी याद;
वादे की तरह हम भी फ़रामोश हो गए।
अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है;
कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है।
हया से सिर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना;
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना।
रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा;
अब तुझे दर्द की दौलत नहीं मिलने वाली।
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ;
अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ।
अनुवाद:
ख़ूब-तर = बेहतर
कागज़ की कश्ती से पार जाने की ना सोच;
चलते हुए तुफानो को हाथ में लाने की ना सोच;
दुनिया बड़ी बेदर्द है, इस से खिलवाड़ ना कर;
जहाँ तक मुनासिब हो, दिल बचाने की सोच।
दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है;
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।



