बेहतर दिनो की आस लगते हुए हबीब;
हम बेहतरीन दिन भी गंवाते चले गए।
शहर अगर तलब करे तुम से इलाज-ए-तीरगी;
साहिब-ए-इख़्तियार हो आग लगा दिया करो।
अनुवाद:
इलाज-ए-तीरगी = अंधेरे के लिए इलाज
साहिब-ए-इख़्तियार = अधिकारिक व्यक्ति
सामने मंज़िल थी और पीछे उसका वजूद;
क्या करते हम भी यारों;
रुकते तो सफर रह जाता चलते तो हमसफ़र रह जाता।
कुछ तो शराफत सीख ले ऐ इश्क़ शराब से;
बोतल पे लिखा तो है मैं जानलेवा हूँ।
सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है;
मगर जब गुफ़्तगू करता है चिंगारी निकलती है;
लबों पर मुस्कुराहट दिल में बेज़ारी निकलती है;
बड़े लोगों में ही अक्सर ये बीमारी निकलती है।
मुद्दते बीत गई ख्वाब सुहाना देखे;
जगता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा!
हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा;
'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता।
अपनी तस्वीर बनाओगे तो होगा एहसास;
कितना दुश्वार है ख़ुद को कोई चेहरा देना।
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं;
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।
जाने क्या सोच के लहरे साहिल से टकराती हैं;
और फिर समंदर में लौट जाती हैं;
समझ नहीं आता कि किनारों से बेवफाई करती हैं;
या फिर लौट कर समंदर से वफ़ा निभाती हैं।



