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जहाँ याद न आये तेरी वो तन्हाई किस काम की;
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की;
बेशक़ अपनी मंज़िल तक जाना है हमें;
लेकिन जहाँ से अपने न दिखें, वो ऊंचाई किस काम की।

गए दोनों जहाँ के काम से हम न इधर कि रहे न उधर के रहे;
न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के रहे न उधर के रहे।

क्या ख़ूब कहा है ग़ालिब ने;
ऐ चाँद तू किस मज़हब का है;
'ईद' भी तेरी, 'करवाचौथ' भी तेरा।

कबर की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूं;
लोग मरते हैं तो गुरूर कहाँ जाता है!

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इरादे बाँधता हूँ, सोचता हूँ, तोड़ देता हूँ;
कहीं ऐसा न हो जाये, कहीं वैसा न हो जाये।

जिसमे याद ना आए वो तन्हाई किस काम की;
बिगड़े रिश्ते ना बने तो खुदाई किस काम की;
बेशक इंसान को ऊंचाई तक जाना है;
पर जहाँ से अपने ना दिखें वो उँचाई किस काम की।

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प्यार में कोई तो दिल तोड़ देता है;
दोस्ती में कोई तो भरोसा तोड़ देता है;
ज़िंदगी जीना तो कोई ग़ुलाब से सीखे;
जो खुद टूट कर दो दिलों को जोड़ देता है।

अब आ गए हो आप तो आता नहीं कुछ याद;
वरना कुछ हम को आप से कहना ज़रूर था।

उठा कर चूम ली हैं चंद मुरझायी हुई कलियां;
न तुम आये तो यूँ जश्न-ए-बहारा कर लिया मैंने।

नींद आए या ना आए, चिराग बुझा दिया करो;
यूँ रात भर किसी का जलना, हमसे देखा नहीं जाता!

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