किसके लिए तूने यह जन्नत बनाई, ऐ खुदा;
कौन है यहाँ जो तेरा गुनहगार नहीं!
अभी महफ़िल में चेहरे नादान नज़र आते हैं;
लौ चिरागों की ज़रा और घटा दी जाये।
सितम की रस्में बहुत थीं लेकिन, न थी तेरी अंजुमन से पहले;
सज़ा खता-ए-नज़र से पहले, इताब ज़ुर्मे-सुखन से पहले;
जो चल सको तो चलो के राहे-वफा बहुत मुख्तसर हुई है;
मुक़ाम है अब कोई न मंजिल, फराज़े-दारो-रसन से पहले।
होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके;
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया।
तेरी आँखों के जादू से तू ख़ुद नहीं है वाकिफ़;
ये उसे भी जीना सीखा देती है जिसे मरने का शौक़ हो।
मंज़िलों के ग़म में रोने से मंज़िलें नहीं मिलती;
हौंसले भी टूट जाते हैं अक्सर उदास रहने से।
ख़ुदा तो मिलता है, इंसान ही नहीं मिलता;
यह चीज़ वो है जो देखी कहीं-कहीं मैंने।
फर्क होता है खुदा और फ़क़ीर में;
फर्क होता है किस्मत और लकीर में;
अगर कुछ चाहो और न मिले तो समझ लेना;
कि कुछ और अच्छा लिखा है तक़दीर में।
हमें अपने घर से चले हुए सरे राह उमर गुजर गई;
कोई जुस्तजू का सिला मिला न सफर का हक ही अदा हुआ।
लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया;
जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया;
पहले कहाँ ये नाज़ थे, ये इश्वा-ओ-अदा;
दिल को दुआएँ दो तुम्हें क़ातिल बना दिया।



