इस डूबी हुई नाव का किनारा हो तुम;
मेरी ज़िंदगी का आखिरी अंजाम हो तुम;
यूँ तो हर मुश्किल को पार करने की हिम्मत है मुझमे;
बस तुम को खोने के अंजाम से डरते हैं हम।
दिल से बाहर निकलने का रास्ता तक ना ढूंढ सकी वो;
दावा करती थी जो मेरी रग-रग से वाकिफ़ होने का।
रहिये अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो;
हम सुख़न कोई न हो और हम ज़ुबाँ कोई न हो;
बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाना चाहिए;
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो;
पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार;
और अगर मर जाइए, तो नौहाख़्वाँ कोई न हो।
उनको इन्साँ मत समझ, हो सरकशी जिनमें 'जफर';
खाकसारी के लिये है खाक से इन्साँ बना।
इक तर्ज़-ए-तगाफुल है सो वह उनको मुबारक;
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है, सो हम करते रहेंगे।
फ़रिश्ते से बेहतर है इंसान बनना;
मगर इसमें लगती है मेहनत ज्यादा!
बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना;
इक आग से जज्बों की भड़काए हुए रहना;
आदत ही बना ली है तुम ने तो मुनीर अपनी;
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना!
देखने आये थे वो अपनी मोहब्बत का असर,
कहते हैं कि आये हैं आयदात कर के।
तुमने चाहा है मुझे ये करम क्या कम है;
तुम प्यार करते हो मुझसे ये भरम क्या कम है;
एक दिन ये भरम टूटेगा मेरा,
उफ़ किस्मत का ये सितम क्या कम है
हर मुस्कुराहट से सरगरनी है;
क्या यही आलिम जवानी है;
आ तुझे एक राज़ बतलाऊं,
मैं भी फ़ानी हूँ, तू भी फ़ानी है।



