हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे,
तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर;
ए दिल! तुझे दुश्मनों की पहचान कहाँ,
तू हल्क़ा-ए-यारां में भी मोहतात रहा कर।
लहरों को शांत देख कर यह मत समझना कि समंदर में रवानी नहीं है;
जब भी उठेंगे तूफ़ान बन कर उठेंगे, अभी उठने की ठानी नहीं है।
शायरी छोड़ दी तो भूलने लगी हैं दुनिया;
जब लिखते थे शायरी तो एक नाम था अपना।
कोई गुजराती बचा लाया;
कोई बिहारी बचा लाया;
कोई तेलुगुओं के लिए हाहाकार करने लगा;
इसी गहमा-गहमी में हिन्दुस्तानी बह गया।
उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं;
क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं...
रूह के रिश्तों की ये गहराइयाँ तो देखिये;
चोट लगती है हमें और चिल्लाती है माँ;
चाहे हम खुशियों में माँ को भूल जायें दोस्तों;
जब मुसीबत सर पे आ जाए, तो याद आती है माँ।
अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक़सर;
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है...
महबूब का घर हो या फरिश्तों की ज़मी;
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा।
लगे है फोन जबसे तार भी नहीं आते;
बूढी आँखों के अब मददगार भी नहीं आते;
गए है जबसे शहर में कमाने को लड़के;
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।
मेरी तकदीर को बदल देंगे मेरे बुलंद इरादे;
मेरी किस्मत नहीं मोहताज मेरे हाँथों की लकीरों की..



