​तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था;
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।

जम्हूरियत वो तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें;
बंदों को सिर्फ़ गिना जाता है तोला नहीं जाता।

सरहदों पर बहुत तनाव है क्या​;​​​​
कुछ पता तो करो चुनाव है क्या​;​​
खौफ बिखरा है दोनों समतो में​;​​
तीसरी समत का दबाव है क्या​।

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एक अख़बार हूँ, ओकात ही क्या मेरी;
मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ..

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यहाँ हर किसी को दरारों में झाँकने की आदत है;
दरवाजा खोल दो, कोई पूछने भी नही आयेगा।

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा;
इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जायेगा;
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है;
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।

दुश्मनी का सफ़र एक कदम दो कदम
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जायेंगे।

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जिस नजाकत से ये लहरे मेरे पैरों को छूती है​;​​​
​यकीन नही होता इन्होने कभी कश्तियाँ डूबाई होगी​...

रुखसत हो गए तुम बिना किसी लिहाज़ के​;​
​महफ़िल जवाँ थी, पर अफ़सोस कमबख्त हो तुम मिजाज़ के।

एक ही चौखट पे सर झुके;
तो सुकून मिलता है;
भटक जाते हैं वो लोग;
जिनके हजारों खुदा होते है।

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