वो ज़ालिम मेरी हर ख्वाहिश ये कह कर टाल जाता है;
दिसम्बर जनवरी में कौन नैनीताल जाता है;
मुनासिब है कि पहले तुम भी आदमखोर बन जाओ;
कहीं संसद में खाने कोई चावल दाल जाता है।
आँख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो;
ज़िंदा रहना है तो, तरकीबें बहुत सारी रखो;
ले तो आये शायरी बाज़ार में राहत मियाँ;
क्या ज़रूरी है की लहजे को भी बाज़ारी रखो।
चढ़ती थीं उस मज़ार पर चादरें बेशुमार;
बाहर बैठा कोई फ़क़ीर सर्दी से मर गया।
बुलंदियों की ख्वाइशें तो बहुत है मगर;
दूसरों को रौंदने का हुनर कहाँ से लायें...?
एक ही चौखट पर सर झुके तो सुकून मिलता है;
भटक जाते हैं वो लोग जिनके हजारों खुदा होते है।
लुत्फ़-ए-हमसायगी-शम्स-ओ-क़मर को छोड़ूँ;
और इस खिदमत-ए-पैगाम-ए-सेहर को छोड़ूँ।
चलो आओ बताऊ तुम्हें एक निशानी उदास लोगों की;
कभी गौर करना ये हस्ते बहुत है।
एक तेरी ना से तंग आकर इस्तीफ़ा देने चला है दिल;
कोई इसे समझाये कि प्यार में यूँ केजरीवाल-केजरीवाल नही खेलते।
हिन्दू बनो तो मथुरा, मुस्लिम बनो तो मक्का;
इंसान अगर रहो तो सारा जहां तुम्हारा है।
ये दबदबा, ये हकूमत, ये नशा-ए-दौलत;
सब किराये के मकान हैं, किराएदार बदलते रहते है।



