मैं बेवक़ूफ़,
मैं बेवक़ूफ़,
मैं बेवक़ूफ़,
मैं बेवक़ूफ़,
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आहिस्ता बोलो आवाज़ यहाँ तक आ रही है।
अगर हो तो सबको बताने की क्या ज़रुरत है।
नज़र से नज़र मिला कर तो देखो;
किसी को अपना बना कर तो देखो;
मिलना चाहेंगे सब लोग आप से;
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दिन में एक बार नहा कर तो देखो।
आज कल की दुनिया में शरीफ, सच्चे और प्यारे दोस्त मिलना बहुत ही मुश्किल है।
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मैं खुद हैरान हूँ कि तुम लोगों ने मुझे ढूंढ कैसे लिया?
आँसू तेरे निकले तो आँखें मेरी हों;
दिल तेरा धड़के तो धड़कन मेरी हो;
दोस्ती हमारी इतनी गहरी हो;
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सड़क पर तू पिटे और गलती मेरी हो।
माना कि तेरी नज़र में कुछ भी नहीं हूँ मैं;
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मेरी अहमियत उनसे पूछना जिनके मैंने पैसे देने हैं।
संग-ए-मरमर सा तराशा गोरा ये बदन;
नशीला सा पिघलता शबाब उसका;
होंठों से लगाओ तो कशिश कैसी है;
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ये कुल्फी चीज़ ही ऐसी है।
जब से तुम्हें देखा है, मेरा
रात को
दिन को
सुबह को
शाम को
खेलते वक़्त
सोते वक़्त
जागते वक़्त
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हँस-हँस के बुरा हाल है।
इतना खूबसूरत कैसे मुस्कुरा लेते हो;
इतना कातिल कैसे शर्मा लेते हो;
एक बात बताओ दोस्त,
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बचपन से ही कमीने हो या सूरत ही ऐसी बना लेते हो?
जब से तुम्हें जाना है, जब से तुम्हें पाया है;
हर दुआ में तेरा ही नाम आया है;
ताकि पूछ सकूँ रब से,
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यह कैसा नमूना बनाया है।
तू चाँद मांगे मैं चाँद दे दूँ;
तू रात मांगे मैं रात दे दूँ;
तू दिल मांगे मैं दिल दे दूँ;
तू जान मांगे...
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बस यार.
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भीख मांगने की भी हद होती है।



