एक निवेदन:
अब दिवाली बीत गयी है तो पटाके ना छोड़ें, अपने घर वालों से भी मिलवाएं और शादी की बात करें।
हमारे कमीनेपन की हद मत पूछ गालिब,
हम तो बचपन में दोसत को साईकल के आगे बिठाकर,जान बूझकर उसकी ऊंगलियां ब्रेक में भींच दिया करते थे।
दारु का ठेका और पतंजलि की दुकान भारत के किसी भी कोने में मिल सकती हैं।
मैं शपथ लेता हूँ कि इस साल दिपावली में चाइना में निर्मित लाइटों को नहीं लूंगा, क्योंकि मेरे पास पिछले साल की पड़ी हैं।
चेक भी कर ली हैं, ठीक हैं।
उनकी गली से गुज़रे तो उनकी रंगोली भी देख आए।
गज़ब का बनाती है, मुझे तो लगा था बस मुँह बनाना आता होगा।
क्या बताएं ग़ालिब आलम-ए-बेबसी अपनी नौकरी और ज़िन्दगी का कि
अब तो दीवाली भी रूठ कर इतवार को जा पहुंची है।
एक और छुट्टी गई।
आज का ज्ञान:
जेब में लक्ष्मीकांत हो तो ज़िंदगी प्यारेलाल बन ही जाती है।
चाँद ने गुस्सा करते हुए कहा, "जब लड़कियाँ कुँवारी होती हैं, तो चाँद में अपना होने वाला पति देखती हैं और जब शादी हो जाती है तो अपने बच्चों से कहती हैं, वो देखो चंदा मामा।"
कम से कम रिश्ते का तो ख्याल रखें हमारी भी कोई इज़्ज़त है ब्रह्माण्ड में।
बीवी के हाथ से बने खाने में विशेष स्वाद देखना चाहते हो तो इंतज़ार कीजिये उस दिन का,
जब उसके मायके वाले आने वाले हों।
जब तक नकली मावा, नकली घी वाली ख़बरें न्यूज़ में नहीं आ जाती, तब तक लगता ही नहीं है कि दिवाली आने वाली है।



